काल्पनिक नहीं है प्राचीन काल का राम सेतु ...वैज्ञानिक भी मान चुके है इसके चमत्कार
नई दिल्ली। प्राचीन काल से चले आ रहे इस राम सेतु को रामायण काल से जोड़ा जाता है साथ ही इसमें तैरते पथ्रों पर वैज्ञानिक भी रिसर्च कर रहें हैं। कुछ ऐसे तथ्य हैं जो चौका देने वाले हैं। कहा जाता रहा है कि इन पत्थों पर राम नाम लिख कर समुद्र में फेंका गया था। जो अब तक भी समुंद्र में तैर रहे हैं।
समुद्र पर बने इस रामसेतु को दुनिया भर में 'एडम्स ब्रिज 'के नाम से भी जाना जाता है। यह पुल भारत के रामेश्वरम से शुरू होकर श्रीलंका के मन्नार को जोड़ता है। कुछ लोग इसे ईश्वर का चमत्कार मानते हैं तो साइंस इसके पीछे अपने अलग ही तर्क देता है। हालांकि कुछ वैज्ञानिक रामसेतु को एक सुपर ह्यूमन एचीवमेंट मानते हैं। इस पुल निर्माण में इस्तेमाल किए गए पत्थरों को जानने के लिए लोगों में आज भी जिज्ञासा है।
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कहा जाता है कि इस पुल को वानरों ने केवल पांच दिन में बना लिया था। इस पर वैज्ञानिकों का कहना है कि नल व नील जानते थे कि कौनसा पत्थर पानी में किस प्रकार रखा जाए कि वह डूबे नहीं तथा अन्य पत्थरों को सहारा भी प्रदान हो। इसलिए उन्होंने 'प्यूमाइस स्टोन' का उपयोग किया होगा। यह ऐसे पत्थर हैं जो ज्वालामुखी के लावा से उत्पन्न होते हैं, इनमे कई सारे छिद्र होने के कारण ये स्पंजी या खांकरा रूप ले लेते हैं और पानी में डूबते नहीं हैं। इस तरह के पत्थरों का वजन सामान्य से कम होता है।
हालांकि अब यह सेतु समुद्र के तल में चला गया है। जिसको नासा ने सैटेलाइट की मदद से खोज निकाला था। भारतीय सेटेलाइट और अमेरिका के अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान नासा ने उपग्रह की मदद से जो फोटो ली थी उससी से नासा को पता चल पाया था कि भारत और श्रीलंका के बीच समुद्र में 48 किलोमीटर चौड़ी भू-भाग पट्टी है, जिसको राम सेतु के नाम से जाना जाता है।
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